साक्ष्य सेतु
«दोहरी पूर्ति» को धर्मशास्त्रीय बचाव-रास्ते से अधिक बनाने के लिए कौन-सा पाठीय प्रमाण आवश्यक है?
पाठक बाद के प्रेरित पुनर्पठन को संभव ईसाई धर्मशास्त्र मान सकेगा, पर केवल बाद के अनुप्रयोग को ही दूसरे क्षितिज का प्रमाण बनाकर उसे सत्यापित भविष्यवाणी नहीं कहेगा।
इस लेख से क्या स्थापित हुआ
भविष्यवाणी में ढाँचे, पुनरावृत्ति या बाद के अनुप्रयोग हो सकते हैं। पर «दोहरी पूर्ति» प्रमाण तभी बनती है जब नियंत्रक पाठ अपने मूल क्षितिज से अधिक अपेक्षा करने का कारण दे। चिह्न के बिना दूसरी पूर्ति धर्मशास्त्रीय संभावना है, सत्यापित भविष्यवाणी नहीं।
- सत्यापित: बाद के अनुप्रयोग को जाँचने से पहले मूल ऐतिहासिक क्षितिज स्थापित करना होगा।
- संभव: भविष्यवाणी का आवर्ती या परतदार महत्त्व हो सकता है।
- सत्यापित दोहरी भविष्यवाणी के लिए आवश्यक: पाठीय या पहले से अधिकृत प्रमाण कि पहला क्षितिज भविष्यवाणी को पूरा समाप्त नहीं करता।
- ईसाई धर्मशास्त्र में संभव: बाद का प्रेरित पाठ अधिक पूर्ण दिव्य आशय प्रकट करे।
- तोराह-प्रथम जाँच में असमर्थित: दूसरे क्षितिज का एकमात्र प्रमाण बाद का अनुप्रयोग हो और फिर भी उसे «पूरी हुई भविष्यवाणी» कहा जाए।
जो प्रश्न अभी बाकी है
पेशात, मूल वक्ता और श्रोता, भविष्य-सूचक पाठीय चिह्न तथा साहित्यिक श्रेणी को सामने रखने पर विवादित नए नियम की भविष्यवाणी-दावों की व्यापक जाँच क्या दिखाती है?
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